भटकन का आदर्श

वेदना मे एक शक्ति है जो द्रष्टि देती है।जो यातना मे है,वह द्रष्टा हो सकता है

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अज्ञेय का शेखर वेदना की दुकान चलाता है |

Posted On 5 Jun, 2016 में

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यह ब्लॉग ‘शेखर: एक जीवनी’ की समीक्षा बिलकुल नहीं है | दरअसर अज्ञेय के लिखे की समीक्षा करने की मेरी हैसियत ही नहीं है | मेरा लिखाव उस साझेपन को समझने की कोशिश भर है जो किताब के भीतरी चरित्रों की बाहरी दुनिया से एकरूपता स्थापित करता है |अज्ञेय का शेखर एक मध्यमवर्गीय पात्र है इसीलिए शायद हमारे समाज का बड़ा हिस्सा अपने भीतर अपने -अपने शेखर जी रहा है |हालांकि किताबी शेखर किताब की तरह अधूरा लगता है |वह समाज से या तो गायब है या फिर हर दो कदम पर दिख कर महत्वहीन हो गया है |
‘शेखर :एक जीवनी’ आजादी के पहले की रचना है | तब से अब तक शेखर के बारे में बहुत कुछ कहा जा चुका है |मैं भी कोई नयी बात नहीं कहने जा रहा हूँ | बस मेरा लिखाव इस लिहाज से जरूर नया हो सकता है की मेरी समझ शेखर पर ज़िंदा शिखरों के सहयोग से बनी है |पिछले तमाम सालों से मैं एक शेखर को जानता हूँ |यकीनन कुछ शेखरों को आप भी जानते होंगे |मैं जिस ‘शेखर’ को जानता हूँ वह बिलकुल किताबी शेखर जैसा है | उसी शेखर के सहारे मैं किताबी शेखर के बारे में कुछ बेबाक कहने का साहस कर पा रहा हूँ |
शेखर एक बहुत ही महान किस्म का आदमी है |वह कमाल का जिज्ञासु है |उसका स्वभाव उस बच्चे सा है जो किसी भी चीज को देखकर उसे जानने के लिए उसकी ओर भागने से खुद को रोक नहीं पाता है | शेखर क्रान्ति करना चाहता है |शेखर खुद को विद्रोही कहता है |शेखर लम्बे -लम्बे व्याख्यान देता है |वह तमाम फिलास्फियां जानता है |शेखर प्रकृति से प्यार करता है |शेखर पिता को आदर्श मानता है |शेखर हद तक रोमांटिक है |उसका व्यक्तित्व इतना रोचक है की हर लड़की को उससे प्यार हो जाता है |
बहुत हो गया |अब पर्दा खुलता है |….ये क्या ???
शेखर में जिज्ञासा है पर समाधान के लिए जरूरी सब्र की कमी है |वह क्रान्ति जैसा कुछ करना तो चाहता है पर उसमे बड़े इरादों के लिए आवश्यक लगन नहीं है |वह न क्रान्ति करता है ,न शांति से बैठता है | वह हद तक अहंकारी है |उसे अपने आगे सब कुछ बौना नजर आता है |दम्भी तो वह एक नंबर का है | दरअसर शेखर के पास महानता जैसा कुछ है नहीं इसलिए अपने इर्द -गिर्द के सारे लोगों को वह बौना महसूस कराता है |यही खुद को जबरदस्ती महान बनाने का उसके लिए एक मात्र रास्ता है |वह प्यार करता है पर उसमे एकनिष्ठता नहीं है | हर औरत को प्यार देने से कहीं ज्यादा वह हर औरत का प्यार पाना चाहता है पर उसमे प्यार करने की क्षमता नहीं है | अपनी ज़िंदगी में आई हर औरत से उसे प्यार हो जाता है |अपनी बहन को वह सरस कह देता है |शारदा के साथ रहकर भी उसे दूसरों का ख्याल आता है |वह अपने इस ख्याल पर चिंता भी करता है |उसकी ज़िंदगी की सबसे नजदीकी पात्र शशि है पर उसके साथ उसका अजीब सा उलझाव है | न ही वह खुलकर सारे संबंधों से परे मुक्त संबंधों को सहजता से स्वीकार करता है ओर न ही परम्परागत निगाहों से उसे बहन मान पता है |
वह एक साथ तमाम औरतों से प्यार करता है पर किसी का विश्वास नहीं जीत पाता | वह दावा करता है कि वह शशि की सारी बाते मान लेता है पर इस कदर शशि की तरफ उसके झुकाव की बड़ी वजह यह हो सकती है है की शशि भी उसकी सारी भदेशता बेशर्त स्वीकार कर लेती है | जाते -जाते वह अपना स्व शेखर में मिला देना चाहती है |सबसे बड़ी बात तो यह की वह शेखर को महान मानती है ओर शेखर महान माने जाने के लिए जीवनी भर तड़पा है |वह समाज में बदलाव लाना चाहता है पर वह खुद में निरा असमाजिक है | वह खुद के प्रति घोर ईमानदार भी नहीं है जैसा की प्रस्तावना में लेखक कहता है |वह खुद को महान विद्रोही दिखाता है पर उसका सारा विद्रोह खुद से भागने का जरिया है |उसकी सारी क्रांतिकारिता एक काले लिबास जैसी है जिससे वह खुद की क्षमताहीनता और नकारेपन को छुपा लेना चाहता है |हालांकि उसकी मां उसकी इस कमजोर नस को जानती है | ‘मुझे तो इसका भी विशवास नहीं’ |इसीलिये शेखर मां से नफरत करता है | |दरअसर उसे उसके बचपन ने ऐसा गढ़ा है कि वह सचमुच विशवास के लायक नहीं है|
वह हद तक अहंकारी है |उसे अपने आगे सब कुछ बौना नजर आता है |दम्भी तो वह एक नंबर का है | दरअसर शेखर के पास महानता जैसा कुछ है नहीं इसलिए अपने इर्द -गिर्द के सारे लोगों को वह बौना महसूस कराता है |शेखर जानता है की वह सहज रहा तो पकड़ा जायेगा |इसलिए वह अपने नकारेपन को विद्रोह और क्रांतिकारिता के कपड़ों से ढककर फिलासफाइस किया करता है | समझदारों की माने तो शेखर में किसी किस्म की गम्भीर काम विकृति है जिसे सिगमंड फ्रायड के जरिये समझा जा सकता है |उसे फ़ौरन इलाज की जरूरत है |
शेखर कहता है की उसे वेदना से शक्ति मिलती है |लेकिन वह इस वेदना को जीने की बजाय इसकी दूकान चलाता है |शशि की पिता की मौत के बाद वह उसके घर यह सोचकर रुकता है क़ी दुःख की छाँव में वह तपस्या करेगा |उसे जानेगा | लेकिन इस बात का अहसास वह हर दूसरे संवाद में शशि को कराता है | उसके आस -पास आने वाले हर इंसान को पता है की वह वेदना में है | वह अपनी तकलीफों को मार्केटाइस करता फिरता है |
शेखर का कोई भविष्य नहीं है | उसमे किसी भी तरह के सृजन की क्षमता नहीं है | वह विकृत कामुकता को अंत तक फिलासफाइस करता रहता है |उपन्यास की शशि शायद इसीलिए अंत में मर जाती है |ईमानदार उपन्यासकार को यकीन था की शशि को अगर वह नहीं मारेगा तो शेखर शशि के रहते ही दूसरी और अपना कदम बढ़ाकर उस सारे माहौल को बिगाड़ देगा जिसे उपन्यासकार दो भागों में बड़ी मुश्किल से मामूली किरदार लेकर महान सा बनाने की कोशिश की है |
आप सभी शेखर के जानकार ‘गुनाहों के देवता’ के चन्दर से जरूर वाकिफ होंगे | वह चन्दर जो शेखर की तरह कन्फ्यूज नहीं है | जो अपनी बहन से यह नहीं कहता की “तुम बहन जितनी पास होती है उतनी पास नहीं हो और बहन जितनी दूर होती है उतनी दूर भी नहीं हो |” शेखर की तरह अपनी विकृत कामुकता से हर चीज को मैली देखने की बजाय शारीरिक संबंधों की अनिवार्यता और प्रेम की पवित्रता को एक साथ समझा है |
सुनो समाज के भले लोगों!! शेखर वेदना का व्यापारी हो गया है | शेखर समाज का आदर्श नहीं हो सकता |दरअसर आदर्श से गिरना ही शेखर होना है |अपनी कमजोरियों को फिलास्फाइस करना शेखर होना है |शेखर जहां भी दिखे उसे मार देना चाहिए |उसके अवशेषों को भी गहरे कहीं दफना देना चाहिए |अच्छे समाज को शेखर की नहीं चन्दर की जरूरत है |
आशुतोष तिवारी

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