भटकन का आदर्श

वेदना मे एक शक्ति है जो द्रष्टि देती है।जो यातना मे है,वह द्रष्टा हो सकता है

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औसत एक धोखा देने वाला शब्द है |

Posted On 16 Apr, 2016 में

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औसत शब्द का धड़ल्ले से प्रयोग सामजिक जीवन में खूब होता है | अखबार में छपे लेख हर दिन कोई न कोई औसत दर बता जाते हैं |इंसानो की कामगारी नापने के लिए औसत सबसे सुरक्षित रूपक समझा जाता है | यह शब्द किसी की ज्यादा इज्जत और घोर बेइजती के बीचो- बीच की सीमा पर डटा हुआ मिलता है |फलां आदमी औसत है , ऐसा कहकर हम तमाम कहाव और सवालों से बच सकते हैं |जीवन के एक ऐसे स्तर पर जहां आदमी मर मर कर जीता हुआ न दिखे ,औसत जीवन कहा जा सकता है | दफ्तरों में जिन सहयोगियों के काम को लेकर हम कन्फूज है ,उन्हें आसानी से औसत कर्मचारियों की लिस्ट में डाला जा सकता है | औसत होना हमे ज्यादा सामजिक बनता है |औसत होना दुनिया भर के झमेलों से आपकी रक्षा करता है |पिछले कुछ सालों में माध्यम वर्ग के लिए बड़ा कीमती शब्द बनकर उभरा होता है |
औसत एक न दिखने वाला शब्द है |औसत कभी नहीं होता | औसत कोई नहीं होता | फिर भी हर जगह औसत मौजूद रहता है |यह शब्द शायद किसी रूमानी शून्यता से उपजा है |दफ्तर में कोई न कोई औसत होता है |क्लास में एक तबका औसत होता है |जन्म दर , मर्त्य दर , वृद्धि दर आदि आदि दरों के ठीक पहले औसत मुस्तैदी से डटा रहता है | औसत होने में कोई नैतिक संकट नहीं है पर औसत शायद एक बोझ बनती भीड़ का परिचायक है | औसत व्यवहारिक हो सकता है पर वह बेहद हल्का और ढोने में माहिर होता है | औसत बॉस की अतिरिक्त इज्जत करता है |वह काम करता हुआ सबको दिख जाना चाहता है | औसत गरीब नहीं दिखना चाहता | औसत सबको न्याय दिलाता है , नहीं शायद आंकड़ों के आगे लगकर न्याय दिलाने का ढोंग करता है |
औसत एक धोखा देने वाला शब्द है | ओशो ने कहा था की औसत जैसा कुछ होता ही नहीं | क्या औसत जैसा कुछ होता है | एक आदमी की आय १०० रूपये है दूसरे की २० रुपए तो औसत आय क्या होगी | औसत आय होगी ६० रुपए |यानी दोनों की आय ६० रुपए है |क्या ऐसा है ? यह गणित के सवाल का सवाल नहीं है बल्कि अब यह सामजिक जीवन में भी डेटा जर्नलिज्म और सोशल स्टैटिक्स की दुनिया में उपयोगी हो गया है | कुछ भी बराबर नहीं होता लेकिन राज्य को सब कुछ बराबर दिखाना पड़ता है |राज्य की इस मंशा में औसत शब्द उसका सबसे चालाक सहयोगी है |आप प्रति व्यकि आय देखिएगा फिर खुश होने की बजाय उस दिन- रात गहरी होती खाई को भी देखिएगा जो औसत की आड़ में आपसे छिपा दी जाती है |
सामाजिक जीवन में औसत सिर्फ और सिर्फ एक बौद्धिक मिथक है |यह राज्य सत्ता का दोस्त और आम जनता का दुश्मन है |अच्छा हो यह गणित तक सीमिर रहे |सामजिक जीवन में औसत तमाम गैर- बराबरियों को पाटने की बजाय उसे छूपा देता है |
आशुतोष तिवारी
भारतीय जन संचार संस्थान



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
April 21, 2016

बहुत सुंदर और सच्चा लेख है तिवारी जी आपका । हार्दिक अभिनंदन । सांख्यिकी के संदर्भ में कहा जाता है कि आंकड़े कुछ भी सिद्ध कर सकते हैं और कुछ भी सिद्ध नहीं कर सकते । औसत उपलब्ध आंकड़ों से ही निकाला जाता है और यह उन आंकड़ों से भी अधिक भ्रमित करने वाला अंक सिद्ध होता है जो सरकारों तथा प्रशासन की अकुशलता पर ही नहीं, आम जनता की पीड़ाओं पर भी परदा डाल देता है । औसत के अंक का प्रयोग ऐसे किया जाता है मानो उसका उद्भव ही आंकड़ों और तथ्यों पर विश्वास करने वालों को ठगने के लिए हुआ हो ।

batman के द्वारा
April 22, 2016

shukriya ..shree maan


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