भटकन का आदर्श

वेदना मे एक शक्ति है जो द्रष्टि देती है।जो यातना मे है,वह द्रष्टा हो सकता है

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सुनो प्रिय !!!.. लोग इश्क में ‘शायर’ होने की बजाय ‘शहर’ हो रहे हैं |

Posted On 11 Apr, 2016 में

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सुनो प्रिय ,
तुम्हारा ख्याल मेरे ख्यालों की चौखट का सबसे कीमती पर्दा है | वक्त की नाजुक बुनावट से बना एक ऐसा झीना पर्दा, जिससे मेरा हर ख्याल होकर गुजरता है |मेरे राजीव चौक से जीवन में तुम इंद्रप्रस्थ बन कर आई हो | समय के समुंदर में एक ज्वार आया था |मन की रेत पर एक आकृति उभरी थी |यकीन मानो प्रिय !!!उसकी बनावट के स्केच तुमसे मैच होते हैं | तुम्हारा एहसास मेरे वजूद की परफ्यूम बन गया है |मैं हर पल महकने लगा हूँ | नजर के सामने आये हर इंसान को रोक कर प्यार करने का मन होता है | सोचता हूँ , सबके लबों पर एक मुस्कान चिपकाता हुआ उसके कान में बोलूं ..”तुम इस दुनिया की सबसे खूबसूरत रचना हो” |
हमारे समय का इश्क शब्दों की त्रासदी से होकर गुजर रहा है | सोशल मीडिया की इमोजीयों ने शायरियों को बेदखल कर दिया है |हम मोहब्बत को जी कम रहे हैं ,बक ज्यादा रहे है | लोग इश्क में ‘शायर’ होने की बजाय ‘शहर’ हो रहे हैं |मोहब्बत सिर्फ आई लव यू बोल देना भर नहीं है |वेलेंटाइन होना नहीं है |साथ रहना भी नहीं है | मोहब्बत वक्त के साथ चलते हुए ‘मैं और ‘तुम’ का ‘हम’ हो जाना है | शून्य में भटकती दो बेताब रूहों का मिल जाना है | कुछ भी बोलने का इंतज़ार मत करना |बस एहसास करना | इश्क एक साधना है प्रिय !! जिस दिन बेजानियत भी प्यारी लगने लगे, समझो तुमने मोहब्बत में एक मुकाम हासिल कर लिया है |
मेरा अपना ‘आप’ तुम्हारे ‘तुम’ जैसा है इसीलिए मैने अपना ‘आप’ तुम्हे सौंप दिया है | तुम अपना ‘तुम’ मुझसे भी सलामत रखना |अगर हमारा वजूद कोई कविता होता तो ‘मेरापन’ उस कविता का सबसे कीमती लब्ज होता | इश्क -ए- इकरार को या आधार कार्ड के नाम पर सरकार को इसे यू ही नहीं दे देना चाहिए |
सुनो प्रिय !! मैं एक सफर पर निकला था |वो सफर अब खत्म होने वाला है | मैं किसी शाम की तरह ढल रहा हूँ |शहर की शामें अजनबी होती है |क्या पता, वो शामें किसी रोज मुझे भी अजनबी बना दें |सूरज का अकेला यूं ही अस्त हो जाना मुझे रुला जाता है |
किसी रोज उसके साथ मुझे भी अस्त होना होगा | तुम परेशान मत होना प्रिय | तुम्हारे जहन के सबसे खूबसूरत हिस्से में मैं यूं ही धड़कता रहूँगा |
तुम्हारा “तुम”
(यह खत एक काल्पनिक रचना है )
आशुतोष तिवारी
भारतीय जन संचार संस्थान



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jlsingh के द्वारा
April 19, 2016

मोहब्बत वक्त के साथ चलते हुए ‘मैं और ‘तुम’ का ‘हम’ हो जाना है | शून्य में भटकती दो बेताब रूहों का मिल जाना है | कुछ भी बोलने का इंतज़ार मत करना |बस एहसास करना | इश्क एक साधना है प्रिय !! जिस दिन बेजानियत भी प्यारी लगने लगे, समझो तुमने मोहब्बत में एक मुकाम हासिल कर लिया है | – बहुत ही सुन्दर और शास्वत पंक्तियां आदरणीय आशुतोष तिवारी जी. आपने अपनी भावना का संचार कर दिया है. आज तो अनेको माध्यम है संचार के सोचिये उस काल की बात जब आदिकवि कालीदास ने अपने प्रेम इजहार किया था और मेघ को दूत बनाकर अपने दिल की सारी बातें कह दी थी. सादर! बेहतरीन !

batman के द्वारा
April 20, 2016

शुक्रिया …समय मिले तो कभी ब्लॉग पर आइये | गूगल पर बिना स्पेस इस तरह mychintandarshan टाइप कीजिए | ‘भटकन का आदर्श’ नाम है |


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